पाठ-1, क्षितिज भाग-2
सूरदास (व्याख्या)
सूरदास (व्याख्या)
(1)
ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी।
अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी।।
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।
ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी।।
प्रीति नदी मैं पाउँ न बोरयौ, दृष्टि न रूप परागी।
प्रीति नदी मैं पाउँ न बोरयौ, दृष्टि न रूप परागी।
‘सूरदास’ अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी।।
शब्दार्थ : अति-बहुत, बड़भागी-भाग्यशाली, अपरस-अछूता, सनेह-प्रेम, तगा- धागा/बंधन नाहिन-नहीं, अनुरागी-प्रेम में लगा, पुरइनि पात-कमल का पत्ता, देह-शरीर (पत्ता), दाग- पानी का दाग (गिला होना), गागरि-मटका, प्रीति नदी-प्रेम की नदी (कृष्ण का प्रेम स्वरूप), पाउँ-पैर, बोरयौ-डुबोना, परागी-मुग्ध होना।
भावार्थ - इन पंक्तियों में गोपियाँ उद्धव (श्रीकृष्ण के मित्र, जो गोपियों के लिए योग का संदेश लेकर आए हैं।) से अपनी व्यथा (दुख) कह रही हैं। वे उद्धव पर कटाक्ष कर रही हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उद्धव तो कृष्ण के निकट रहते हुए भी उनके प्रेमरूप से नहीं बँधे हैं। वे कहती हैं कि उद्धव बड़े ही भाग्यशाली हैं क्योंकि उन्हें कृष्ण के साथ रहते हुए भी उनके प्रेम स्वरूप से ज़रा भी मोह नहीं है। उद्धव के मन में किसी भी प्रकार का बंधन या अनुराग नहीं है बल्कि वे तो कृष्ण के प्रेम से जैसे अछूते हैं। गोपियों के अनुसार उद्धव उस कमल के पत्ते के सामान है, जो हमेशा जल में रहकर भी उसमे डूबता नहीं है और न ही जल के दाग-धब्बों को खुद पर आने देता है। फिर उद्धव की तुलना करते हुए कहती हैं कि वह तेल से भरी गागर के समान है, जिसमें पानी की एक भी बूँद नहीं ठहरती है क्योंकि उद्धव कृष्ण के मित्र होकर भी उनके प्रेमरूप को समझ नहीं पाए हैं। गोपियाँ व्यंग्य करती हैं कि उद्धव तो बहुत ज्ञानी है इसलिए प्रेम की नदी (कृष्ण का प्रेम स्वरूप) के पास होकर भी उसमें पैर नहीं डुबाते, डुबकी नहीं लगाते और उनका मन कृष्ण के इस रूप को देखकर भी परागी (मोहित) नहीं होता है। सूरदास के अनुसार गोपियाँ तो अबला और भोली हैं। वे तो कृष्ण के प्रेम में इस तरह से लिपट गईं हैं, जैसे गुड़ से चींटियाँ चिपक जाती हैं अर्थात् कृष्ण के प्रेम में अनुरक्त हैं।
(2)
मन की मन ही माँझ रही।
कहिए जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही।।
अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही।
अब इन जोग सँदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही।।
चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही।
‘सूरदास’ अब धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही।।
कहिए जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही।।
अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही।
अब इन जोग सँदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही।।
चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही।
‘सूरदास’ अब धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही।।
शब्दार्थ : माँझ-में, परत-बात, अवधि-समय, अधार-आधार, आवन-आना, बिथा- व्यथा/पीड़ा, जोग सँदेसनि-योग का संदेश, बिरहिनि-बिछड़कर जीने वाली, बिरह दही-विरह (बिछड़ना) की आग में जलना, हुतीं-थी, गुहारि-रक्षा के लिए पुकारना, जितहिं तैं-जहाँ से, उत तैं-उधर से, धार-धारा (योग संदेश की धारा), धीर धरहिं-धैर्य धारण करना, मरजादा न लही-मर्यादा न रहना।
व्याख्या-गोपियाँ अपने मन की व्यथा का वर्णन उद्धव से करती हैं। वे कहती हैं कि वे अपने मन का दर्द व्यक्त करना चाहती हैं लेकिन किसे जाकर कहे, उनकी मन की बात मन में ही रह गई है। वे कृष्ण सेे बहुत कुछ कहना चाहती थीं पर अब नहीं कह पाएँगी क्योंकि कृष्ण ने स्वयं न आकर उद्धव को भेज दिया है। वे कहती हैं कि वे इतने समय से कृष्ण के लौट आने की आस (आशा/उम्मीद) को आधार मानकर तन-मन की पीड़ा को सह रही थीं। उन्हें आस थी कि जब कृष्ण आएँगे तो उनकी व्यथा दूर हो जाएगी पर कृष्ण ने स्वयं न आकर उद्धव के द्वारा योग (ज्ञान) का संदेश भेज दिया है। जिसे सुनकर हमारी व्यथा की अग्नि और भड़क गई है और वे किसी योगिनी की तरह इसमें जल रहीं हैं अर्थात् उनका दुख और बढ़ गया है। वे कहती हैं कि हम तो अपनी व्यथा को दूर करने के लिए कृष्ण को पुकार रही थीं परन्तु रक्षक ही अब हमारे दुख का कारण है। जिसे हमारी रक्षा करनी चाहिए थी, वहाँ से तो अब योग संदेश की धारा बह रही है। सुरदास के अनुसार गोपियाँ कहती हैं कि जब कृष्ण ने प्रेम की मर्यादा का पालन ही नहीं किया तो फिर गोपियों क्यों धीरज धरें।
(3)
हमारैं हरि हारिल की लकरी।
मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।।
जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जकरी।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।।
सु तौ ब्याधि हमकौ लै आए, देखी सुनी न करी।
यह तौ ‘सूर’ तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी।।
हमारैं हरि हारिल की लकरी।
मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।।
जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जकरी।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।।
सु तौ ब्याधि हमकौ लै आए, देखी सुनी न करी।
यह तौ ‘सूर’ तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी।।
शब्दार्थ : हारिल-पक्षी (जो सदा एक लकड़ी को पकड़कर रखता है।), क्रम-कर्म, नंद-नंदन-नंद के पुत्र श्रीकृष्ण, दृढ़ करि पकरि- दृढ़ता से पकड़ा, शब्दार्थ : निसि-रात, जकरि-जपना, जोग-योग, करुई ककरि-कड़वी ककड़ी, शब्दार्थ : ब्याधि-रोग, हमकौ लै आए-हमारे लिए लेकर आए, तिनहिं-उनको, चकरी-घूमने वाला (चंचल)।
व्याख्या-गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि जिस तरह हारिल (एक प्रकार का पक्षी) अपने पंजों में सदा एक लकड़ी को बड़ी ढृढ़ता से पकड़कर रखता है, उसे कहीं भी गिरने नहीं देता। उसी प्रकार हमने अपने ह्रदय में, कर्म में, वचन में नंद बाबा के पुत्र कृष्ण को बड़ी ही ढृढ़ता से बसा रखा है। वही हमारे जीवन का आधार है। गोपियाँ कहती हैं कि हम तो सोते-जागते, दिन-रात, सपने में केवल कृष्ण को ही जपते हैं। हमारे मन केवल हरि का ही वास है। उद्धव तुम्हारा यह योग संदेश तो कड़वी ककड़ी के समान है, जिसे हम अपना नहीं सकते। इसका हम पर कोई असर नहीं होगा। गोपियाँ कहती हैं कि उद्धव तुम योग संदेेश के नाम पर ऐसा रोग लेकर आ गए हो, जिसके बारे में न तो हमने कभी सुना है, और न ही किसी को होते हुए देखा है। तुम यह योग संदेश उन्हें सुनाओ, जिनका मन चंचल है, चकरी के समान है, कहीं स्थिर नहीं है। शायद वे यह संदेश सुनकर विचलित हो जाएँ। हमारा मन तो पूरी तरह से कृष्ण की भक्ति में लीन है, स्थिर है।
(4)
हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।
समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।।
इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।
बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए।।
हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।
समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।।
इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।
बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए।।
ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।
अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।।
ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।
राज धरम तौ यहै ‘सूर’, जो प्रजा न जाहिं सताए।।
अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।।
ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।
राज धरम तौ यहै ‘सूर’, जो प्रजा न जाहिं सताए।।
शब्दार्थ : मधुकर-भँवरा (उद्धव को मधुकर (भँवरा) कहा गया है, हुते-थे, पहिलैं-पहले, बढ़ी-बहुत, पठाए-भेजा, आगे के-पहले के, पर हित-दूसरों की भलाई, डोलत धाए-घूमते थे, अपनै मन-अपना मन, फेर पाइहैं-फिर से पाना, अनीति-अन्याय।
व्याख्या-गोपियाँ कहती हैं कि कृष्ण ने राजनीति का पाठ पढ़ लिया है, वे किसी राजनीतिज्ञ की तरह हो गये हैं। स्वयं न आकर ऊधव को भेज दिया है ताकि वहाँ बैठे-बैठे ही मधुकर (ऊधौ) के द्वारा गोपियों का सब समाचार, हालचाल प्राप्त कर ले और उन्हीं के द्वारा योग संदेश भी भेज दिया। गोपियाँ कहती हैं कि एक तो उद्धव पहले ही बहुत चतुर था, उस पर अपने गुरु कृष्ण द्वारा ग्रंथ (राजनीति का पाठ) पढ़ाने से और भी चालाक हो गया है। हम कृष्ण की बुद्धि को भी मान गए कि उन्होंने बड़ी चतुराई से उद्धव को सीखा-पढ़ाकर हमारे लिए योग संदेश भेजा। वे कहती हैं कि उद्धव बड़े लोग तो हमेशा अपने से पहले दूसरों की भलाई के लिए कार्य करते हैं पर कृष्ण ने स्वयं हमसे मिलने न आकर योग का संदेश भेजा है, जिससे हम उन्हें भूल जाए। वे दुखी होकर कहती हैं कि इससे हमारा मन तो हमें वापस मिल जाएगा जो कृष्ण यहाँ से जाते समय चुराकर ले गए थे। सूरदास कहते हैं कि गोपियों को यह बात समझ में नहीं आ रही है कि जो कृष्ण दूसरो को न्याय का पाठ पढ़ाते हैं, वे उनके साथ इतना बड़ा अन्याय कैसे कर सकते हैं। उनके अनुसार किसी भी राजा का धर्म, कर्तव्य यही होता है कि वह अपनी प्रजा के दु:ख का ख्याल रखे, न की उन्हें सताए किन्तु यहाँ तो कृष्ण स्वयं ही उन्हें दुःख दे रहे हैं। होना तो यह चाहिए था कि वे अपना कर्तव्य निभाते हुए गोपियों से मिलने आते और उनकी व्यथा, विरह की पीड़ा को दूर करते।
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