Sunday, May 12, 2019

पाठ-1, क्षितिज भाग-2, सूरदास के पद (प्रश्नोत्तर)

1. गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान कहने में क्या व्यंग्य निहित है?
उत्तर - गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान कहने में यह व्यंग्य निहित है कि उद्धव वास्तव में भाग्यवान न होकर अभागे हैं। वे कृष्ण के सान्निध्य में रहते हुए भी उनके प्रेमरूप से मुक्त रहे। कृष्ण के प्रति उनके हृदय में अनुराग उत्पन्न नहीं हुआ अर्थात् कृष्ण के साथ कोई व्यक्ति यदि एक क्षण भी व्यतीत कर ले तो वह कृष्णमय हो जाता है किन्तु उद्धव इस अनुभूति से पूर्णतया अपरिचित हैं। वे कृष्ण के ज्ञानरूप से तो परिचित हैं पर उनके प्रेम स्वरूप से अनभिज्ञ हैं।

2. उद्धव के व्यवहार की तुलना किस-किससे की गई है?
उत्तर - गोपियों ने उद्धव के व्यवहार की तुलना निम्नलिखित से की है-
गोपियों ने उद्धव की तुलना कमल के पत्ते से की हैं, जो जल में रहते हुए उसकी एक बूँद भी अपने ऊपर नहीं रहने देता। इसी प्रकार कृष्ण के साथ रहते हुए भी उद्धव पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
उद्धव जल में रखी तेल की गागर (मटके) की भाँति हैं, जिस पर जल की एक बूँद भी टिक नहीं पाती। ऐसे ही उद्धव भी कृष्ण के समीप रहते हुए भी उनके रूप के आकर्षण तथा प्रेम-बंधन से सर्वथा मुक्त हैं।
कृष्णरूपी प्रीति नदी के निकट रहते हुए भी उद्धव ने उसमें पाँव नहीं डुबाया इसलिए वे स्नेह से सर्वथा अनजान हैं।

3. गोपियों ने किन-किन उदाहरणों के माध्यम से उद्धव को उलाहने दिए हैं?
उत्तर - गोपियों ने कमल के पत्ते, तेल की मटकी और प्रेम की नदी में पाँव न डुबाना आदि उदाहरणों के माध्यम से उद्धव को उलाहने दिए हैं। गोपियाँ उन्हें 'बड़भागी' भी कहती हैं, जो कृष्ण के साथ रहकर भी प्रेम के बंधन से मुक्त हैं। उन्हें प्रेम के मायने नहीं पता हैं। वे उनके योग संदेश को कड़वी ककड़ी कहती हैं, जिसे वे अपना नहीं सकती।

4. उद्धव द्वारा दिए गए योग के संदेश ने गोपियों की विरहाग्नि में घी का काम कैसे किया?
उत्तर:- गोपियाँ कृष्ण के आने की उम्मीद में अपने तन-मन की व्यथा को सहती हुई दिन गिन रही थीं। वे इसी इंतज़ार में थीं कि श्री कृष्ण उनके विरह को समझेंगे, उनके प्रेम को समझेंगे और उनसे मिलने अवश्य आएँगे परन्तु कृष्ण ने स्वयं ना आकर योग का संदेश देने के लिए उद्धव को भेज दिया। विरह की अग्नि में जलती हुई गोपियों को जब उद्धव ने कृष्ण को भूल जाने और योग-साधना करने का उपदेश देना प्रारम्भ किया, तब गोपियों की विरह वेदना और भी बढ़ गयी । इस प्रकार उद्धव द्वारा दिए गए योग के संदेश ने गोपियों की विरह अग्नि में घी का काम किया।

5. ‘मरजादा न लही’ के माध्यम से कौन-सी मर्यादा न रहने की बात की जा रही है?
उत्तर:- ‘मरजादा न लही’ के माध्यम से प्रेम की मर्यादा न रहने की बात की जा रही है। कृष्ण के मथुरा चले जाने पर गोपियाँ कृष्ण के लौटने की प्रतीक्षा कर रही थीं। वे अपनी मर्यादा में रहकर वियोग को सहन कर रही थीं किन्तु कृष्ण ने उनसे मिलने न आकर प्रेम की मर्यादा का उल्लंघन करते हुए योग का संदेश देने के लिए उद्धव को भेज दिया और गोपियों को उनको उनकी मर्यादा छोड़कर बोलने पर मजबूर कर दिया। इस प्रकार कृष्ण ने प्रेम की मर्यादा नहीं रखी। वापस लौटने का वचन देकर भी वे गोपियों से मिलने नहीं आए।

6. कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम को गोपियों ने किस प्रकार अभिव्यक्त किया है?
उत्तर - गोपियाँ रात-दिन, सोते-जागते, यहाँ तक की स्वप्न में भी सिर्फ़ कृष्ण का नाम ही रटती रहती है। कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम को गोपियों ने चींटियों और हारिल की लकड़ी के उदाहरणों द्वारा व्यक्त किया है। उन्होंने स्वयं की तुलना चींटियों से और कृष्ण की तुलना गुड़ से की है। उनके अनुसार कृष्ण उस गुड़ की भाँति हैं, जिस पर चींटियाँ चिपकी रहती हैं। हारिल एक ऐसा पक्षी है जो सदैव अपने पंजे में कोई लकड़ी या तिनका पकड़े रहता है। वह उसे किसी भी दशा में नहीं छोड़ता। उसी तरह गोपियों ने मन, वचन और कर्म से श्री कृष्ण की प्रेमरूपी लकड़ी को दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया है।

7. गोपियों ने उद्धव से योग की शिक्षा कैसे लोगों को देने की बात कही है?
उत्तर - उद्धव अपने योग के संदेश में मन की एकाग्रता का उपदेश देते हैं। गोपियों के अनुसार योग की शिक्षा उन लोगों को देनी चाहिए, जिनकी इन्द्रियाँ व मन उनके बस में नहीं होते। जिनका मन चंचल, दुविधा में है तथा इधर-उधर भटकता है। गोपियों को योग की आवश्यकता नहीं है क्योंकि गोपियाें का मन कृष्ण के प्रेम में एकाग्र, स्थिर है इसलिए यह उनके लिए निरर्थक है।

8. प्रस्तुत पदों के आधार पर गोपियों का योग-साधना के प्रति दृष्टिकोण स्पष्ट करें।
उत्तर - प्रस्तुत पदों के आधार पर स्पष्ट है कि गोपियाँ योग-साधना को नीरस, व्यर्थ और अवांछित मानती हैं। गोपियों के दृष्टि में योग उस कड़वी ककड़ी के सामान है, जिसे निगलना बड़ा ही मुश्किल है। सूरदास जी गोपियों के माध्यम से आगे कहते हैं कि उनके विचार में योग एक ऐसा रोग है, जिसे उन्होंने न पहले कभी देखा, न कभी सुना। गोपियों के अनुसार योग की शिक्षा उन्हीं लोगों को देनी चाहिए, जिनकी इन्द्रियाँ व मन उनके बस में नहीं होते। जिनका मन चंचल है और इधर-उधर भटकता है। परन्तु गोपियों को योग की आवश्यकता नहीं है क्योंकि गोपियाँ अपने मन व इन्द्रियाँ तो कृष्ण के अनन्य प्रेम में पहले से ही एकाग्र है।

9. गोपियों के अनुसार राजा का धर्म क्या होना चाहिए?
उत्तर - गोपियों के अनुसार राजा का धर्म नीति का मार्ग अपनाते हुए राजधर्म का पालन करना और प्रजा के साथ न्याय करना होना चाहिए। राजा का धर्म अपनी प्रजा के सुख-दु:ख का ध्यान रखना होना चाहिए न कि उसे सताना। राजा को प्रजा के कल्याण के लिए समर्पित रहना  चाहिए।

10. गोपियों को कृष्ण में ऐसे कौन-से परिवर्तन दिखाई दिए, जिनके कारण वे अपना मन वापस पा लेने की बात कहती हैं?
उत्तर - गोपियों को लगता है कि कृष्ण द्वारका जाकर राजनीतिज्ञ हो गए हैं। कृष्ण पहले से ही चतुर थे, अब तो ग्रंथो को पढ़कर उनकी बुद्धि और भी अधिक चतुर हो गई है। छल-कपट उनके स्वभाव का अंग बन गया है। उन्हें प्रेम की मर्यादा पालन का ध्यान नहीं है। वे राजधर्म भूलकर अनीति कर रहे हैं। उन्होंने गोपियों से मिलने के स्थान पर योग की शिक्षा देने के लिए उद्धव को भेज दिया है। कृष्ण के इस कदम से गोपियों का हृदय बहुत आहत हुआ है। इन्ही परिवर्तनों को देखकर गोपियाँ अपने मन को कृष्ण के अनुराग से वापस लेना चाहती है।

11. गोपियों ने अपने वाक्चातुर्य के आधार पर ज्ञानी उद्धव को परास्त कर दिया, उनके वाक्चातुर्य की विशेषताएँ लिखिए?
उत्तर - गोपियों के वाक्चातुर्य की विशेषताएँ इस प्रकार है -
• निडरता - गोपियाँ पूरी तरह से निडर हैं। वे उद्धव को कोसने से परहेज नहीं करतीं। वे उनके योग सन्देश को कड़वी ककड़ी और बीमारी बताती हैं।
• व्यंग्यात्मकता - गोपियों में व्यंग्य करने की अद्भुत क्षमता है। वे उद्धव को 'बड़भागी' कहती हैं क्योंकि वह कृष्ण के पास रहकर भी प्रेम से अछूते रहे। यह कहकर वह उद्धव का उपहास करती हैं।
• स्पष्टता - वे स्पष्ट शब्दों में उद्धव को बताती हैं कि वे कृष्ण के प्रेम में पूरी तरह से लीन हैं इसलिए उनके योग संदेश का उन पर कुछ असर नहीं पड़ने वाला है।
• तार्किकता - गोपियाँ अपनी तर्क क्षमता से हर बात पर उद्धव को निरुत्तर कर देती हैं। वे अपने उपालंभ (तानों) के द्वारा उद्धव को चुप करा देती हैं।

12. संकलित पदों को ध्यान में रखते हुए सूर के भ्रमरगीत की मुख्य विशेषताएँ बताइए?
उत्तर - भ्रमरगीत की निम्नलिखित विशेषताएँ इस प्रकार हैं –
• भ्रमरगीत एक भाव-प्रधान गीतिकाव्य है।
• इसमें भावनाओं का मनोवैज्ञानिक चित्रण हुआ है।
• निर्गुण और निराकार भक्ति से ज्यादा सगुण और साकार भक्ति को ज्यादा महत्व दिया गया है।
• भ्रमरगीत में साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।
• भ्रमरगीत में उपालंभ की प्रधानता है।
• भ्रमरगीत में सूरदास ने विरह के समस्त भावों की स्वाभाविक एवं मार्मिक व्यंजना की हैं।
• भ्रमरगीत में उद्धव व गोपियों के माध्यम से ज्ञान के स्थान पर प्रेम को सर्वोपरि कहा गया है।
• भ्रमरगीत में संगीतात्मकता का गुण विद्यमान है।
• अनुप्रास, उपमा, रूपक, अतिशयोक्ति आदि अनेक अलंकारों का सुन्दर प्रयोग किया गया है।


रचना और अभिव्यक्ति
13.  गोपियों ने उद्धव के सामने तरह–तरह के तर्क दिए हैं, आप अपनी कल्पना से और तर्क दीजिए।
उत्तर - गोपियों ने उद्धव के सामने तरह-तरह के तर्क दिए हैं। हम भी निम्नलिखित तर्क दे सकते हैं –
• उद्धव पर कृष्ण का प्रभाव तो पड़ा नहीं परन्तु लगता है कृष्ण पर उद्धव की योग साधना का प्रभाव अवश्य पड़ गया है।
• यदि यह योग संदेश इतना ही प्रभावशाली है तो इसे देने कृृष्ण स्वयं क्यों नहीं आए।
• जब सगुण उपस्थित है तो निर्गुण उपासना का मार्ग क्यों अपनाया जाए।
• योग का मार्ग बहुत कठिन है और गोपियाँ कोमल हैं। उनसे यह कठोर योग साधना कैसे हो पाएगी। यह असम्भव है।

14. उद्धव ज्ञानी थे, नीति की बातें जानते थे ; गोपियों के पास ऐसी कौन–सी शक्ति थी जो उनके वाक्चातुर्य में मुखिरत हो उठी?
उत्तर - सच्चे व एकनिष्ठ प्रेम में इतनी शक्ति होती है कि बड़े-से-बड़ा ज्ञानी भी उसके आगे घुटने टेक देता है। गोपियों के पास कृष्ण के प्रति सच्चे प्रेम तथा भक्ति की शक्ति थी, जिस कारण उन्होंने उद्धव जैसे ज्ञानी तथा नीतिज्ञ को भी अपने वाक्चातुर्य से परास्त कर दिया।

15. गोपियों ने यह क्यों कहा कि हरि अब राजनीति पढ़ आए हैं? क्या आपको गोपियों के इस कथन का विस्तार समकालीन राजनीति में नज़र आता है, स्पष्ट कीजिए।
उत्तर - गोपियों को लगता है कि कृष्ण द्वारका जाकर राजनीतिज्ञ गए हैं। अब कृष्ण राजा बनकर चाले चलने लगे हैं। छल-कपट उनके स्वभाव का अंग बन गया है। गोपियों ने ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि कृष्ण ने सीधी सरल बातें ना करके रहस्यातमक ढंग से उद्धव के माध्यम से अपनी बात गोपियों तक पहुँचाई है। गोपियों का यह कथन कि हरि अब राजनीति पढ़ आए हैं, आज की भ्रष्ट राजनीति को परिभाषित कर रहा है। आज की राजनीति तो सिर से पैर तक छल-कपट से भरी हुई है। कृष्ण ने गोपियों को मिलने का वादा किया था और पूरा नहीं किया वैसे ही आज राजनीति में लोग कई वादे करके भूल जाते हैं। चुनाव होने के बाद अपने क्षेत्र में जाते तक नहीं है।

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