Wednesday, May 15, 2019

व्याकरण - पद-परिचय, कक्षा १०

पद-परिचय

पद क्या होता है?
जब कोई शब्द अकेला हो; जैसे 'कमल' तब वह शब्द कहलाता है। लेकिन इसी शब्द को जब वाक्य में अन्य शब्दों के साथ उपयोग किया जाए, तब यह पद कहलाता है।
जैसे - कमल का फूल सुंदर है।
यहाँ कमल, फूल, सुंदर तीनों ही पद हैं।
अत: वाक्य में प्रयुक्त प्रत्येक सार्थक शब्द को पद कहते हैं।

पद-परिचय
आपसे यदि आपका परिचय पूछा जाए तो शायद आपका परिचय हो-मैं एक लड़का/लड़की हूँ। मेरा नाम      है। मेरी आयु      है आदि। अपने बारे में कुछ इस तरह की जानकारी देंगे।
इसी प्रकार व्याकरणिक दृष्टि से पद का परिचय देना पद-परिचय (व्याकरणिक परिचय) कहलाता हैं। पद परिचय में उस पद के भेद, उपभेद, लिंग, वचन, कारक आदि के परिचय के साथ, वाक्य में प्रयुक्त अन्य पदों के साथ उसके सम्बन्ध का भी उल्लेख किया जाता है।

व्याकरण की दृष्टि से पद पाँच प्रकार के होते हैं-
1 संज्ञा 2 सर्वनाम 3 क्रिया 4 विशेषण 5 अव्यय (क्रियाविशेषण, संबंधबोधक, समुच्चयबोधक, विस्मयादिबोधक)।
पद परिचय देते समय निम्नलिखित पहलुओं की जानकारी देनी चाहिए :–
1.संज्ञा – संज्ञा का भेद (व्यक्तिवाचक, जातिवाचक, भाववाचक), लिंग, वचन, कारक, क्रिया के साथ पद का संबंध।
2. सर्वनाम – सर्वनाम का भेद (पुरुषवाचक, प्रश्नवाचक, निश्चयवाचक, अनिश्चयवाचक, संबंधवाचक, निजवाचक), लिंग, वचन, कारक, क्रिया के साथ पद का संबंध।
3. क्रिया – क्रिया का भेद (कर्म के आधार पर (अकर्मक, सकर्मक) या रचना के आधार पर (संयुक्त, प्रेरणार्थक, पूर्वकालिक, नामधातु), लिंग, वचन, धातु, काल (वर्तमान, भूत, भविष्य), वाच्य, कर्ता का संकेत।
4. विशेषण – विशेषण का भेद (गुणवाचक, परिमाणवाचक, संख्यावाचक, सार्वनामिक), विशेष्य, लिंग, वचन।
5. क्रियाविशेषण अव्यय – क्रियाविशेषण का भेद (कालवाचक, स्थानवाचक, रीतिवाचक, परिमाणवाचक), विशेष्य।
6. संबंधबोधक अव्यय (भेद बताना आवश्यक नहीं), अन्य पदों से संबंध का निर्देश।
7. समुच्चयबोधक अव्यय (भेद बताना आवश्यक नहीं), संयुक्त शब्द अथवा वाक्य का उल्लेख।
8. विस्मयादिबोधक अव्यय (भेद बताना आवश्यक नहीं), भाव-सूचक।

संज्ञा पद-परिचय के उदाहरण-
* मोहन विद्यालय जाता है।
मोहन – व्यक्तिवाचक संज्ञा, एकवचन, पुल्लिंग, कर्ता कारक।
विद्यालय – जातिवाचक संज्ञा, एकवचन, पुल्लिंग, कर्म कारक।
* वह इस दुख को नहीं सह सकेगा।,
दुख – भाववाचक संज्ञा, एकवचन, पुल्लिंग, कर्म कारक।

सर्वनाम पद-परिचय के उदाहरण-
* हम नैनीताल घूमने गए।
हम – पुरुषवाचक सर्वनाम, पुल्लिंग, बहुवचन, कर्ता कारक, 'घूमने गए' क्रिया का कर्ता।
* कोई पुस्तक चुराकर ले गया।
कोई – अनिश्चयवाचक सर्वनाम, पुल्लिंग, एकवचन, कर्ता कारक, ‘चुराकर ले गया' क्रिया का कर्ता।

क्रिया पद-परिचय के उदाहरण-
* कृष्ण ने कंस  को मारा।
मारा – सकर्मक क्रिया, पुल्लिंग, एकवचन, कर्तृवाच्य, भूतकाल।
* काला घोड़ा तेज भागता है।
भागता है – अकर्मक क्रिया, वर्तमान काल, पुल्लिंग, एकवचन।

विशेषण पद-परिचय के उदाहरण-
* काले घोड़े तेज़ भागते हैं।
काले – गुणवाचक विशेषण, बहुवचन, पुल्लिंग, ‘घोड़े' विशेष्य।
* राम दूसरी पंक्ति में बैठा है।
दूसरी – संख्यावाचक विशेषण, स्त्रीलिंग, एकवचन, ‘पंक्ति’ विशेष्य।
* वह पुस्तक किसकी है।
वह – सार्वनामिक विशेषण, एकवचन, ‘पुस्तक’ विशेष्य।  

क्रियाविशेषण पद-परिचय के उदाहरण-
* कबीर तेज़–तेज़ चलता है।
तेज़–तेज़ – रीतिवाचक क्रियाविशेषण अव्यय, 'चलता है' विशेष्य।
* सीमा सवेरे टहलने जाती है।
सवेरे – कालवाचक क्रियाविशेषण अव्यय, ‘टहलने जाती है’ विशेष्य।

संबंधबोधक अव्यय पद-परिचय के उदाहरण-
* मेरे घर के पीछे रामलीला मैदान है।
के पीछे – संबंधबोधक अव्यय, ‘घर’ का संबंध  अन्य शब्दों से जोड़ता है।
* बीमारी के कारण उससे खड़ा भी नहीं हो पा रहा।
* के कारण – संबंधबोधक अव्यय, ‘बीमारी’ का संबंध अन्य शब्दों से जोड़ता है।

समुच्चयबोधक अव्यय पद-परिचय के उदाहरण-
* मुझे चाय और कॉफी दोनों पसंद हैं।
और – समुच्चयबोधक अव्यय, ‘चाय और कॉफी' शब्दों को मिला रहा है।
* तुम किताब ले लो लेकिन फाड़ना नहीं।
लेकिन – समुच्चयबोधक अव्यय, 'तुम किताब ले लो' तथा ‘फाड़ना नहीं’ इन दो वाक्यों को जोड़ता है।

विस्मयादिबोधक अव्यय पद-परिचय के उदाहरण-
* वाह! क्या छक्का मारा है।
वाह! – विस्मयादिबोधक अव्यय, प्रशंसा का भाव।
* ठीक! मैं रोज़ आऊँगा।
ठीक! – विस्मयादिबोधक अव्यय, स्वीकार का भाव।

कुछ अन्य उदाहरण-
1 सत्य की सदा जीत होती है।
सत्य – भाववाचक संज्ञा, एकवचन, पुल्लिंग, संबंध कारक
2 हिमालय पर सदा बर्फ जमी रहती है।
हिमालय – व्यक्तिवाचक संज्ञा, एकवचन, पुल्लिंग, अधिकरण कारक
3 बाज़ार से कुछ चीनी ले आना।
कुछ – परिमाणवाचक विशेषण, बहुवचन, ‘चीनी' विशेष्य।
4 स्वतंत्रता दिवस पर जगह-जगह राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है।
स्वतंत्रता – गुणवाचक विशेषण, एकवचन, पुल्लिंग, ‘दिवस’ विशेष्य।
5 सुभद्रा कुमारी कविता लिखती थी।
कविता – जातिवाचक संज्ञा, एकवचन, स्त्रीलिंग, कर्म कारक।
6 चीता जंगली जानवर है।
जंगली – गुणवाचक विशेषण, एकवचन, पुल्लिंग, ‘जानवर’ विशेष्य।
7 रोहन मेरी बात पर बहुत हँसा।
बहुत – परिमाणवाचक क्रियाविशेषण अव्यय, 'हँसा' विशेष्य।
8 वीर पुरुष की सब प्रशंसा करते हैं।
वीर – गुणवाचक विशेषण, एकवचन, पुल्लिंग, ‘पुरुष’ विशेष्य।
9 बहुत से लोग वहाँँ जमा हो गए थे।
बहुत से– संख्यावाचक विशेषण, पुल्लिंग, बहुवचन, ‘लोग’ विशेष्य।
10 भागकर जाओ और बाज़ार से कुछ तो लाओ
भागकर – रीतिवाचक क्रियाविशेषण अव्यय, 'जाओ' विशेष्य।
जाओ – अकर्मक क्रिया, एकवचन, पुल्लिंग, 'जा' धातु, कर्तृवाच्य।
बाज़ार – जातिवाचक संज्ञा, पुल्लिंग, एकवचन, अपादान कारक।
कुछ – अनिश्चयवाचक सर्वनाम, पुल्लिंग, एकवचन, कर्म कारक।
लाओ – पूर्वकालिक क्रिया, एकवचन, पुल्लिंग, 'ला' धातु, कर्मवाच्य।



                           

Tuesday, May 14, 2019

व्याकरण (लेखन कौशल) विज्ञापन लेखन

विज्ञापन लेखन
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* पर्यावरण सुरक्षा, विश्व पुस्तक मेला तथा पेन्सिल के विज्ञापन-









Sunday, May 12, 2019

पाठ-1, क्षितिज भाग-2, सूरदास के पद (प्रश्नोत्तर)

1. गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान कहने में क्या व्यंग्य निहित है?
उत्तर - गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान कहने में यह व्यंग्य निहित है कि उद्धव वास्तव में भाग्यवान न होकर अभागे हैं। वे कृष्ण के सान्निध्य में रहते हुए भी उनके प्रेमरूप से मुक्त रहे। कृष्ण के प्रति उनके हृदय में अनुराग उत्पन्न नहीं हुआ अर्थात् कृष्ण के साथ कोई व्यक्ति यदि एक क्षण भी व्यतीत कर ले तो वह कृष्णमय हो जाता है किन्तु उद्धव इस अनुभूति से पूर्णतया अपरिचित हैं। वे कृष्ण के ज्ञानरूप से तो परिचित हैं पर उनके प्रेम स्वरूप से अनभिज्ञ हैं।

2. उद्धव के व्यवहार की तुलना किस-किससे की गई है?
उत्तर - गोपियों ने उद्धव के व्यवहार की तुलना निम्नलिखित से की है-
गोपियों ने उद्धव की तुलना कमल के पत्ते से की हैं, जो जल में रहते हुए उसकी एक बूँद भी अपने ऊपर नहीं रहने देता। इसी प्रकार कृष्ण के साथ रहते हुए भी उद्धव पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
उद्धव जल में रखी तेल की गागर (मटके) की भाँति हैं, जिस पर जल की एक बूँद भी टिक नहीं पाती। ऐसे ही उद्धव भी कृष्ण के समीप रहते हुए भी उनके रूप के आकर्षण तथा प्रेम-बंधन से सर्वथा मुक्त हैं।
कृष्णरूपी प्रीति नदी के निकट रहते हुए भी उद्धव ने उसमें पाँव नहीं डुबाया इसलिए वे स्नेह से सर्वथा अनजान हैं।

3. गोपियों ने किन-किन उदाहरणों के माध्यम से उद्धव को उलाहने दिए हैं?
उत्तर - गोपियों ने कमल के पत्ते, तेल की मटकी और प्रेम की नदी में पाँव न डुबाना आदि उदाहरणों के माध्यम से उद्धव को उलाहने दिए हैं। गोपियाँ उन्हें 'बड़भागी' भी कहती हैं, जो कृष्ण के साथ रहकर भी प्रेम के बंधन से मुक्त हैं। उन्हें प्रेम के मायने नहीं पता हैं। वे उनके योग संदेश को कड़वी ककड़ी कहती हैं, जिसे वे अपना नहीं सकती।

4. उद्धव द्वारा दिए गए योग के संदेश ने गोपियों की विरहाग्नि में घी का काम कैसे किया?
उत्तर:- गोपियाँ कृष्ण के आने की उम्मीद में अपने तन-मन की व्यथा को सहती हुई दिन गिन रही थीं। वे इसी इंतज़ार में थीं कि श्री कृष्ण उनके विरह को समझेंगे, उनके प्रेम को समझेंगे और उनसे मिलने अवश्य आएँगे परन्तु कृष्ण ने स्वयं ना आकर योग का संदेश देने के लिए उद्धव को भेज दिया। विरह की अग्नि में जलती हुई गोपियों को जब उद्धव ने कृष्ण को भूल जाने और योग-साधना करने का उपदेश देना प्रारम्भ किया, तब गोपियों की विरह वेदना और भी बढ़ गयी । इस प्रकार उद्धव द्वारा दिए गए योग के संदेश ने गोपियों की विरह अग्नि में घी का काम किया।

5. ‘मरजादा न लही’ के माध्यम से कौन-सी मर्यादा न रहने की बात की जा रही है?
उत्तर:- ‘मरजादा न लही’ के माध्यम से प्रेम की मर्यादा न रहने की बात की जा रही है। कृष्ण के मथुरा चले जाने पर गोपियाँ कृष्ण के लौटने की प्रतीक्षा कर रही थीं। वे अपनी मर्यादा में रहकर वियोग को सहन कर रही थीं किन्तु कृष्ण ने उनसे मिलने न आकर प्रेम की मर्यादा का उल्लंघन करते हुए योग का संदेश देने के लिए उद्धव को भेज दिया और गोपियों को उनको उनकी मर्यादा छोड़कर बोलने पर मजबूर कर दिया। इस प्रकार कृष्ण ने प्रेम की मर्यादा नहीं रखी। वापस लौटने का वचन देकर भी वे गोपियों से मिलने नहीं आए।

6. कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम को गोपियों ने किस प्रकार अभिव्यक्त किया है?
उत्तर - गोपियाँ रात-दिन, सोते-जागते, यहाँ तक की स्वप्न में भी सिर्फ़ कृष्ण का नाम ही रटती रहती है। कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम को गोपियों ने चींटियों और हारिल की लकड़ी के उदाहरणों द्वारा व्यक्त किया है। उन्होंने स्वयं की तुलना चींटियों से और कृष्ण की तुलना गुड़ से की है। उनके अनुसार कृष्ण उस गुड़ की भाँति हैं, जिस पर चींटियाँ चिपकी रहती हैं। हारिल एक ऐसा पक्षी है जो सदैव अपने पंजे में कोई लकड़ी या तिनका पकड़े रहता है। वह उसे किसी भी दशा में नहीं छोड़ता। उसी तरह गोपियों ने मन, वचन और कर्म से श्री कृष्ण की प्रेमरूपी लकड़ी को दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया है।

7. गोपियों ने उद्धव से योग की शिक्षा कैसे लोगों को देने की बात कही है?
उत्तर - उद्धव अपने योग के संदेश में मन की एकाग्रता का उपदेश देते हैं। गोपियों के अनुसार योग की शिक्षा उन लोगों को देनी चाहिए, जिनकी इन्द्रियाँ व मन उनके बस में नहीं होते। जिनका मन चंचल, दुविधा में है तथा इधर-उधर भटकता है। गोपियों को योग की आवश्यकता नहीं है क्योंकि गोपियाें का मन कृष्ण के प्रेम में एकाग्र, स्थिर है इसलिए यह उनके लिए निरर्थक है।

8. प्रस्तुत पदों के आधार पर गोपियों का योग-साधना के प्रति दृष्टिकोण स्पष्ट करें।
उत्तर - प्रस्तुत पदों के आधार पर स्पष्ट है कि गोपियाँ योग-साधना को नीरस, व्यर्थ और अवांछित मानती हैं। गोपियों के दृष्टि में योग उस कड़वी ककड़ी के सामान है, जिसे निगलना बड़ा ही मुश्किल है। सूरदास जी गोपियों के माध्यम से आगे कहते हैं कि उनके विचार में योग एक ऐसा रोग है, जिसे उन्होंने न पहले कभी देखा, न कभी सुना। गोपियों के अनुसार योग की शिक्षा उन्हीं लोगों को देनी चाहिए, जिनकी इन्द्रियाँ व मन उनके बस में नहीं होते। जिनका मन चंचल है और इधर-उधर भटकता है। परन्तु गोपियों को योग की आवश्यकता नहीं है क्योंकि गोपियाँ अपने मन व इन्द्रियाँ तो कृष्ण के अनन्य प्रेम में पहले से ही एकाग्र है।

9. गोपियों के अनुसार राजा का धर्म क्या होना चाहिए?
उत्तर - गोपियों के अनुसार राजा का धर्म नीति का मार्ग अपनाते हुए राजधर्म का पालन करना और प्रजा के साथ न्याय करना होना चाहिए। राजा का धर्म अपनी प्रजा के सुख-दु:ख का ध्यान रखना होना चाहिए न कि उसे सताना। राजा को प्रजा के कल्याण के लिए समर्पित रहना  चाहिए।

10. गोपियों को कृष्ण में ऐसे कौन-से परिवर्तन दिखाई दिए, जिनके कारण वे अपना मन वापस पा लेने की बात कहती हैं?
उत्तर - गोपियों को लगता है कि कृष्ण द्वारका जाकर राजनीतिज्ञ हो गए हैं। कृष्ण पहले से ही चतुर थे, अब तो ग्रंथो को पढ़कर उनकी बुद्धि और भी अधिक चतुर हो गई है। छल-कपट उनके स्वभाव का अंग बन गया है। उन्हें प्रेम की मर्यादा पालन का ध्यान नहीं है। वे राजधर्म भूलकर अनीति कर रहे हैं। उन्होंने गोपियों से मिलने के स्थान पर योग की शिक्षा देने के लिए उद्धव को भेज दिया है। कृष्ण के इस कदम से गोपियों का हृदय बहुत आहत हुआ है। इन्ही परिवर्तनों को देखकर गोपियाँ अपने मन को कृष्ण के अनुराग से वापस लेना चाहती है।

11. गोपियों ने अपने वाक्चातुर्य के आधार पर ज्ञानी उद्धव को परास्त कर दिया, उनके वाक्चातुर्य की विशेषताएँ लिखिए?
उत्तर - गोपियों के वाक्चातुर्य की विशेषताएँ इस प्रकार है -
• निडरता - गोपियाँ पूरी तरह से निडर हैं। वे उद्धव को कोसने से परहेज नहीं करतीं। वे उनके योग सन्देश को कड़वी ककड़ी और बीमारी बताती हैं।
• व्यंग्यात्मकता - गोपियों में व्यंग्य करने की अद्भुत क्षमता है। वे उद्धव को 'बड़भागी' कहती हैं क्योंकि वह कृष्ण के पास रहकर भी प्रेम से अछूते रहे। यह कहकर वह उद्धव का उपहास करती हैं।
• स्पष्टता - वे स्पष्ट शब्दों में उद्धव को बताती हैं कि वे कृष्ण के प्रेम में पूरी तरह से लीन हैं इसलिए उनके योग संदेश का उन पर कुछ असर नहीं पड़ने वाला है।
• तार्किकता - गोपियाँ अपनी तर्क क्षमता से हर बात पर उद्धव को निरुत्तर कर देती हैं। वे अपने उपालंभ (तानों) के द्वारा उद्धव को चुप करा देती हैं।

12. संकलित पदों को ध्यान में रखते हुए सूर के भ्रमरगीत की मुख्य विशेषताएँ बताइए?
उत्तर - भ्रमरगीत की निम्नलिखित विशेषताएँ इस प्रकार हैं –
• भ्रमरगीत एक भाव-प्रधान गीतिकाव्य है।
• इसमें भावनाओं का मनोवैज्ञानिक चित्रण हुआ है।
• निर्गुण और निराकार भक्ति से ज्यादा सगुण और साकार भक्ति को ज्यादा महत्व दिया गया है।
• भ्रमरगीत में साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है।
• भ्रमरगीत में उपालंभ की प्रधानता है।
• भ्रमरगीत में सूरदास ने विरह के समस्त भावों की स्वाभाविक एवं मार्मिक व्यंजना की हैं।
• भ्रमरगीत में उद्धव व गोपियों के माध्यम से ज्ञान के स्थान पर प्रेम को सर्वोपरि कहा गया है।
• भ्रमरगीत में संगीतात्मकता का गुण विद्यमान है।
• अनुप्रास, उपमा, रूपक, अतिशयोक्ति आदि अनेक अलंकारों का सुन्दर प्रयोग किया गया है।


रचना और अभिव्यक्ति
13.  गोपियों ने उद्धव के सामने तरह–तरह के तर्क दिए हैं, आप अपनी कल्पना से और तर्क दीजिए।
उत्तर - गोपियों ने उद्धव के सामने तरह-तरह के तर्क दिए हैं। हम भी निम्नलिखित तर्क दे सकते हैं –
• उद्धव पर कृष्ण का प्रभाव तो पड़ा नहीं परन्तु लगता है कृष्ण पर उद्धव की योग साधना का प्रभाव अवश्य पड़ गया है।
• यदि यह योग संदेश इतना ही प्रभावशाली है तो इसे देने कृृष्ण स्वयं क्यों नहीं आए।
• जब सगुण उपस्थित है तो निर्गुण उपासना का मार्ग क्यों अपनाया जाए।
• योग का मार्ग बहुत कठिन है और गोपियाँ कोमल हैं। उनसे यह कठोर योग साधना कैसे हो पाएगी। यह असम्भव है।

14. उद्धव ज्ञानी थे, नीति की बातें जानते थे ; गोपियों के पास ऐसी कौन–सी शक्ति थी जो उनके वाक्चातुर्य में मुखिरत हो उठी?
उत्तर - सच्चे व एकनिष्ठ प्रेम में इतनी शक्ति होती है कि बड़े-से-बड़ा ज्ञानी भी उसके आगे घुटने टेक देता है। गोपियों के पास कृष्ण के प्रति सच्चे प्रेम तथा भक्ति की शक्ति थी, जिस कारण उन्होंने उद्धव जैसे ज्ञानी तथा नीतिज्ञ को भी अपने वाक्चातुर्य से परास्त कर दिया।

15. गोपियों ने यह क्यों कहा कि हरि अब राजनीति पढ़ आए हैं? क्या आपको गोपियों के इस कथन का विस्तार समकालीन राजनीति में नज़र आता है, स्पष्ट कीजिए।
उत्तर - गोपियों को लगता है कि कृष्ण द्वारका जाकर राजनीतिज्ञ गए हैं। अब कृष्ण राजा बनकर चाले चलने लगे हैं। छल-कपट उनके स्वभाव का अंग बन गया है। गोपियों ने ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि कृष्ण ने सीधी सरल बातें ना करके रहस्यातमक ढंग से उद्धव के माध्यम से अपनी बात गोपियों तक पहुँचाई है। गोपियों का यह कथन कि हरि अब राजनीति पढ़ आए हैं, आज की भ्रष्ट राजनीति को परिभाषित कर रहा है। आज की राजनीति तो सिर से पैर तक छल-कपट से भरी हुई है। कृष्ण ने गोपियों को मिलने का वादा किया था और पूरा नहीं किया वैसे ही आज राजनीति में लोग कई वादे करके भूल जाते हैं। चुनाव होने के बाद अपने क्षेत्र में जाते तक नहीं है।

Tuesday, May 7, 2019

पाठ-1, क्षितिज भाग-2
सूरदास (व्याख्या)
(1)
ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी।
अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी।।
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।  
ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी।।   
प्रीति नदी मैं पाउँ न बोरयौ, दृष्टि न रूप परागी।
‘सूरदास’ अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी।।
शब्दार्थ : अति-बहुत, बड़भागी-भाग्यशाली, अपरस-अछूता, सनेह-प्रेम, तगा- धागा/बंधन नाहिन-नहीं, अनुरागी-प्रेम में लगा, पुरइनि पात-कमल का पत्ता, देह-शरीर (पत्ता), दाग- पानी का दाग (गिला होना), गागरि-मटका, प्रीति नदी-प्रेम की नदी (कृष्ण का प्रेम स्वरूप), पाउँ-पैर, बोरयौ-डुबोना, परागी-मुग्ध होना।
भावार्थ - इन पंक्तियों में गोपियाँ उद्धव (श्रीकृष्ण के मित्र, जो गोपियों के लिए योग का संदेश लेकर आए हैं।) से अपनी व्यथा (दुख) कह रही हैं। वे उद्धव पर कटाक्ष कर रही हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उद्धव तो कृष्ण के निकट रहते हुए भी उनके प्रेमरूप से नहीं बँधे हैं। वे कहती हैं कि उद्धव बड़े ही भाग्यशाली हैं क्योंकि उन्हें कृष्ण के साथ रहते हुए भी उनके प्रेम स्वरूप से ज़रा भी मोह नहीं है। उद्धव के मन में किसी भी प्रकार का बंधन या अनुराग नहीं है बल्कि वे तो कृष्ण के प्रेम से जैसे अछूते हैं। गोपियों के अनुसार उद्धव उस कमल के पत्ते के सामान है, जो हमेशा जल में रहकर भी उसमे डूबता नहीं है और न ही जल के दाग-धब्बों को खुद पर आने देता है। फिर उद्धव की तुलना करते हुए कहती हैं कि वह तेल से भरी गागर के समान है, जिसमें पानी की एक भी बूँद नहीं ठहरती है क्योंकि उद्धव कृष्ण के मित्र होकर भी उनके प्रेमरूप को समझ नहीं पाए हैं। गोपियाँ व्यंग्य करती हैं कि उद्धव तो बहुत ज्ञानी है इसलिए प्रेम की नदी (कृष्ण का प्रेम स्वरूप) के पास होकर भी उसमें पैर नहीं डुबाते, डुबकी नहीं लगाते और उनका मन कृष्ण के इस रूप को देखकर भी परागी (मोहित) नहीं होता है। सूरदास के अनुसार गोपियाँ तो अबला और भोली हैं। वे तो कृष्ण के प्रेम में इस तरह से लिपट गईं हैं, जैसे गुड़ से चींटियाँ चिपक जाती हैं अर्थात् कृष्ण के प्रेम में अनुरक्त हैं।
(2)
मन की मन ही माँझ रही।
कहिए जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही।।
अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही।
अब इन जोग सँदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही।।
चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही।
‘सूरदास’ अब धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही।।
शब्दार्थ : माँझ-में, परत-बात, अवधि-समय, अधार-आधार, आवन-आना, बिथा- व्यथा/पीड़ा, जोग सँदेसनि-योग का संदेश, बिरहिनि-बिछड़कर जीने वाली, बिरह दही-विरह (बिछड़ना) की आग में जलना, हुतीं-थी, गुहारि-रक्षा के लिए पुकारना, जितहिं तैं-जहाँ से, उत तैं-उधर से, धार-धारा (योग संदेश की धारा), धीर धरहिं-धैर्य धारण करना, मरजादा न लही-मर्यादा न रहना।
व्याख्या-गोपियाँ अपने मन की व्यथा का वर्णन उद्धव से करती हैं। वे कहती हैं कि वे अपने मन का दर्द व्यक्त करना चाहती हैं लेकिन किसे जाकर कहे, उनकी मन की बात मन में ही रह गई है। वे कृष्ण सेे बहुत कुछ कहना चाहती थीं पर अब नहीं कह पाएँगी क्योंकि कृष्ण ने स्वयं न आकर उद्धव को भेज दिया है। वे कहती हैं कि वे इतने समय से कृष्ण के लौट आने की आस (आशा/उम्मीद) को आधार मानकर तन-मन की पीड़ा को सह रही थीं। उन्हें आस थी कि जब कृष्ण आएँगे तो उनकी व्यथा दूर हो जाएगी पर कृष्ण ने स्वयं न आकर उद्धव के द्वारा योग (ज्ञान) का संदेश भेज दिया है। जिसे सुनकर हमारी व्यथा की अग्नि और भड़क गई है और वे किसी योगिनी की तरह इसमें जल रहीं हैं अर्थात् उनका दुख और बढ़ गया है। वे कहती हैं कि हम तो अपनी व्यथा को दूर करने के लिए कृष्ण को पुकार रही थीं परन्तु रक्षक ही अब हमारे दुख का कारण है। जिसे हमारी रक्षा करनी चाहिए थी, वहाँ से तो अब योग संदेश की धारा बह रही है। सुरदास के अनुसार गोपियाँ कहती हैं कि जब कृष्ण ने प्रेम की मर्यादा का पालन ही नहीं किया तो फिर गोपियों क्यों धीरज धरें।
(3)
हमारैं हरि हारिल की लकरी।
मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।।
जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जकरी।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।।
सु तौ ब्याधि हमकौ लै आए, देखी सुनी न करी।
यह तौ ‘सूर’ तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी।।
शब्दार्थ : हारिल-पक्षी (जो सदा एक लकड़ी को पकड़कर रखता है।),  क्रम-कर्म, नंद-नंदन-नंद के पुत्र श्रीकृष्ण, दृढ़ करि पकरि- दृढ़ता से पकड़ा, शब्दार्थ : निसि-रात, जकरि-जपना, जोग-योग, करुई ककरि-कड़वी ककड़ी, शब्दार्थ : ब्याधि-रोग, हमकौ लै आए-हमारे लिए लेकर आए, तिनहिं-उनको, चकरी-घूमने वाला (चंचल)।
व्याख्या-गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि जिस तरह हारिल (एक प्रकार का पक्षी) अपने पंजों में सदा एक लकड़ी को बड़ी ढृढ़ता से पकड़कर रखता है, उसे कहीं भी गिरने नहीं देता। उसी प्रकार हमने अपने ह्रदय में, कर्म में, वचन में नंद बाबा के पुत्र कृष्ण को बड़ी ही ढृढ़ता से बसा रखा है। वही हमारे जीवन का आधार है। गोपियाँ कहती हैं कि हम तो सोते-जागते, दिन-रात, सपने में केवल कृष्ण को ही जपते हैं। हमारे मन केवल हरि का ही वास है। उद्धव तुम्हारा यह योग संदेश तो कड़वी ककड़ी के समान है, जिसे हम अपना नहीं सकते। इसका हम पर कोई असर नहीं होगा। गोपियाँ कहती हैं कि उद्धव तुम योग संदेेश के नाम पर ऐसा रोग लेकर आ गए हो, जिसके बारे में न तो हमने कभी सुना है, और न ही किसी को होते हुए देखा है। तुम यह योग संदेश उन्हें सुनाओ, जिनका मन चंचल है, चकरी के समान है, कहीं स्थिर नहीं है। शायद वे यह संदेश सुनकर विचलित हो जाएँ। हमारा मन तो पूरी तरह से कृष्ण की भक्ति में लीन है, स्थिर है।
(4)
हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।
समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।।
इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।
बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए।।
ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।
अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।।
ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।
राज धरम तौ यहै ‘सूर’, जो प्रजा न जाहिं सताए।।
शब्दार्थ : मधुकर-भँवरा (उद्धव को मधुकर (भँवरा) कहा गया है, हुते-थे, पहिलैं-पहले, बढ़ी-बहुत, पठाए-भेजा, आगे के-पहले के, पर हित-दूसरों की भलाई, डोलत धाए-घूमते थे, अपनै मन-अपना मन, फेर पाइहैं-फिर से पाना, अनीति-अन्याय।
व्याख्या-गोपियाँ कहती हैं कि कृष्ण ने राजनीति का पाठ पढ़ लिया है, वे किसी राजनीतिज्ञ की तरह हो गये हैं। स्वयं न आकर ऊधव को भेज दिया है ताकि वहाँ बैठे-बैठे ही मधुकर (ऊधौ) के द्वारा  गोपियों का सब समाचार, हालचाल प्राप्त कर ले और उन्हीं के द्वारा योग संदेश भी भेज दिया। गोपियाँ कहती हैं कि एक तो उद्धव पहले ही बहुत चतुर था, उस पर अपने गुरु कृष्ण द्वारा ग्रंथ (राजनीति का पाठ) पढ़ाने से और भी चालाक हो गया है। हम कृष्ण की बुद्धि को भी मान गए कि उन्होंने बड़ी चतुराई से उद्धव को सीखा-पढ़ाकर हमारे लिए योग संदेश भेजा। वे कहती हैं कि उद्धव बड़े लोग तो हमेशा अपने से पहले दूसरों की भलाई के लिए कार्य करते हैं पर कृष्ण ने स्वयं हमसे मिलने न आकर योग का संदेश भेजा है, जिससे हम उन्हें भूल जाए। वे दुखी होकर कहती हैं कि इससे हमारा मन तो हमें वापस मिल जाएगा जो कृष्ण यहाँ से जाते समय चुराकर ले गए थे। सूरदास कहते हैं कि गोपियों को यह बात समझ में नहीं आ रही है कि जो कृष्ण दूसरो को न्याय का पाठ पढ़ाते हैं, वे उनके साथ इतना बड़ा अन्याय कैसे कर सकते हैं। उनके अनुसार किसी भी राजा का धर्म, कर्तव्य यही होता है कि वह अपनी प्रजा के दु:ख का ख्याल रखे, न की उन्हें सताए किन्तु यहाँ तो कृष्ण स्वयं ही उन्हें दुःख दे रहे हैं। होना तो यह चाहिए था कि वे अपना कर्तव्य निभाते हुए गोपियों से मिलने आते और उनकी व्यथा, विरह की पीड़ा को दूर करते।

व्याकरण - पद-परिचय, कक्षा १०

पद-परिचय पद क्या होता है? जब कोई शब्द अकेला हो; जैसे 'कमल' तब वह शब्द कहलाता है। लेकिन इसी शब्द को जब वाक्य में अन्य शब्दों ...